राजसमंद से गोविन्द त्रिपाठी की रिपोर्ट
योग्यता से खिलवाड़ कब तक ? बिना टीईटी पास किए दशकों से सरकारी कुर्सियों पर जमे हैं लाखों शिक्षक : सुप्रीम कोर्ट के कड़े चाबुक के बाद भी नियम बदलने का चौंकाने वाला राजनीतिक दबाव,
अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ की जिला शाखा ने सौंपा एडीएम को ज्ञापन,
राजसमंद। देश की चरमराती सरकारी शिक्षा व्यवस्था और नौनिहालों के भविष्य के साथ खिलवाड़ का एक ऐसा सनसनीखेज सच सामने आया है, जिसने पूरे प्रशासनिक अमले और शिक्षा विभाग को कटघरे में खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा 29 मई 2026 को पुनर्विचार याचिकाओं को सिरे से खारिज किए जाने के बाद यह पूरी तरह साफ हो चुका है कि स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए न्यूनतम योग्यता यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) अनिवार्य है। इस ऐतिहासिक फैसले के बाद यह उम्मीद जगी थी कि अब सरकारी स्कूलों का स्तर सुधरेगा, लेकिन धरातल पर कहानी बिल्कुल उलट नजर आ रही है। वर्ष 2010 से पहले बिना किसी पात्रता परीक्षा के सरकारी सिस्टम में घुसे लाखों शिक्षक अब अपनी अयोग्यता और कमियों को छिपाने के लिए सरकार पर चौतरफा राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव बना रहे हैं। इस बीच अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ राजस्थान (विद्यालय शिक्षा) की जिला शाखा द्वारा प्रदेश के आह्वान पर पुराने जिला कलेक्ट्रेट परिसर के सामने जिलाध्यक्ष सतीश आचार्य के नेतृत्व और विभाग संगठन मंत्री नारायणसिंह चुंडावत, जिला संगठन मंत्री शंकर माली, महिला संगठन मंत्री कल्पना खंडेलवाल के आथित्य में गुरूवार को प्रधानमंत्री और केंद्रीय शिक्षा मंत्री को जिला प्रशासन द्वारा ज्ञापन ने इस पूरे घालमेल की पोल खोल कर रख दी है। ज्ञापना में सुप्रीम कोर्ट के कड़े आदेश को ठेंगा दिखाते हुए इन अपात्र शिक्षकों के लिए बैकडोर एंट्री और स्थाई कानूनी सुरक्षा की वकालत की जा रही है, जिससे जागरूक नागरिकों और अभिभावकों में भारी आक्रोश है।
पुराने जिला कलेक्ट्रेट परिसर के सामने दिया धरना, नारेबाजी और प्रदर्शन करते सौंपा ज्ञापन
जिला मीडिया प्रभारी राजेंद्रसिंह चारण ने बताया कि पुराने जिला कलेक्ट्रेट परिसर के सामने टेट की अनिवार्यता के विरोध में धरना दिया गया। धरने को जिला सभाध्यक्ष ऋषिकेश गुर्जर, पूर्व जिलाध्यक्ष राजेंद्रसिंह चुंडावत, मधु पालीवाल, गणेशलाल कुमावत, मोहनलाल जाट, कौशल्या पालीवाल, राजेश सोनी, भावना पालीवाल, कर्मचारी महासंघ जिलाध्यक्ष कैलाश चंद्र शर्मा आदि ने संबोधित किया। धरना समाप्ति पर शिक्षकों ने प्रदर्शन करते हुए नारेबाजी की और अतिरिक्त जिला कलेक्टर नरेश कुमार बुनकर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के नाम ज्ञापन सौंपा। इस दौरान किरण माली, भगवतसिंह राठौड़, विनोद आचार्य, शिवदास बैरागी, दिनेशचंद्र सालवी, मुकेश चंद्र वैष्णव, हरि राम माली सहित सैकड़ो शिक्षक उपस्थित थे। संचालन जिला मंत्री सुजीत कुमार त्रिपाठी ने किया।
योग्यता से इतना डर क्यों ? सरकारी सिस्टम को खोखला करने वाले 4 कड़वे सच
बच्चों के भविष्य से सरेआम सौदा : एक तरफ सरकार देश को डिजिटल, आधुनिक और वैश्विक स्तर पर खड़ा करने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, वहीं दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में ऐसे शिक्षक डटे हुए हैं जो खुद एक बुनियादी शिक्षक पात्रता परीक्षा (टीईटी) पास करने की काबिलियत नहीं दिखाना चाहते। जब गुरुजी खुद कसौटी पर खरे नहीं उतरेंगे, तो बच्चों का मूल्यांकन कैसे होगा ?
सर्वोच्च अदालत के आदेश की खुली अवमानना : देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में साफ कर दिया है कि शिक्षा की गुणवत्ता और तय मानकों से कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इसके बावजूद ये शिक्षक संगठन अदालती आदेश को मानने के बजाय संसद से विशेष कानून बनवाने पर अड़े हैं। यह सीधे तौर पर खुद को देश के संविधान और विधिक व्यवस्था से ऊपर साबित करने की जिद है।
सीनियरिटी की आड़ में अक्षमता को वीआईपी संरक्षण : दशकों से नौकरी करने और अनुभव की दुहाई देकर ये शिक्षक किसी भी तरह के नए मूल्यांकन, परीक्षा या टेस्ट से भाग रहे हैं। सबसे तीखा सवाल यह उठता है कि जो शिक्षक स्वयं परीक्षा के नाम से घबराता है, वह क्लासरूम में बैठकर बच्चों के भीतर परीक्षा का सामना करने का साहस और आत्मबल कैसे पैदा करेगा।
मेहनती और बेरोजगार युवाओं के हक पर सरेआम डाका : आज देश के लाखों प्रतिभावान, डिग्रीधारी और योग्य युवा रात-दिन एक करके, कोचिंगों में पसीना बहाकर (टीईटी) परीक्षा पास कर रहे हैं और सालों से एक अदद सरकारी नौकरी के लिए कतार में खड़े हैं। दूसरी तरफ बिना पात्रता वाले ये शिक्षक सिर्फ पुरानी तारीखों का हवाला देकर मलाईदार कुर्सियां घेरे बैठे हैं, जिससे योग्य युवाओं का हक सरेआम मारा जा रहा है।
शिक्षक महासंघ की मनमानी और अडिय़ल मांगें : क्या यह सीधे तौर पर ब्लैकमेलिंग है ?
शिक्षक संगठन ने छात्र हितों और कानूनी मर्यादाओं को ताक पर रखकर सरकार के सामने बेहद चौंकाने वाली मांगें रखी हैं, जिसमें (टीईटी) से स्थाई मुक्ति की जिद,बिना पात्रता वालों का प्रमोशन और संसद में विशेष कानून का दबाव है। 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त हुए सभी शिक्षकों को योग्यता परीक्षा (टीईटी) की अनिवार्यता से हमेशा-हमेशा के लिए पूरी तरह मुक्त करने, बिना किसी विधिक योग्यता जांच या न्यूनतम शैक्षणिक मापदंड के इन्हें धड़ल्ले से सिनियोरिटी, प्रमोशन और तमाम वित्तीय सरकारी लाभ देने और कोर्ट के आदेश को बेअसर करने के लिए केंद्र सरकार संसद में विशेष अध्यादेश या संशोधन लाकर अयोग्यता को कानूनी जामा पहनाने की मांग है।
जनता की अदालत में बड़ा सवाल : सरकार झुकेगी या नियम का पालन कराएगी
इस पूरे मामले ने अब एक गंभीर बहस को जन्म दे दिया है। क्या सरकार सिर्फ वोट बैंक के नुकसान, हड़तालों की धमकियों और ताकतवर शिक्षक यूनियनों के इस नाजायज दबाव के आगे घुटने टेक देगी या देश के गरीब और ग्रामीण इलाकों के बच्चों को ताउम्र ऐसे शिक्षकों के भरोसे छोड़ दिया जाएगा जो खुद को समय के साथ अपडेट करने और एक सरकारी कसौटी पर कसने के लिए तैयार नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी तरफ से न्याय का रास्ता साफ कर दिया है। अब जनता की नजरें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह देश में शिक्षा के गिरते स्तर को बचाने के लिए कड़ा रुख अपनाती है या फिर हमेशा की तरह अयोग्यता और ढर्रे को ही संरक्षण देती रहेगी।


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