मां की जिंदगी और अंधविश्वास के बीच जंग, आखिर जीती जिंदगी...*

 



जीला -प्रतापगढ 

तहसील -छोटीसादडी 


गर्भ में बच्चा मर चुका था, परिजन माने नहीं गैर-चिकित्सकीय उपचार ले गए, आशा और सीएचओ गांव-गांव खोजा, जीएनएम पास सरपंच को चिकित्साधिकारी ने समझाया मामला, परिजन माने जिला अस्पताल में भर्ती करवाया

 

प्रतापगढ़, 22 जुलाई। कभी-कभी कुछ मिनटों का सही निर्णय किसी परिवार की पूरी दुनिया बचा देता है। आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र सुहागपुरा के ग्राम वीरपुर में ऐसा ही मामला सामने आया। जहां एक गर्भवती महिला के पेट में पल रहें गर्भस्थ शिशु की धड़कन नहीं थी। लेकिन अंधविश्वास के कारण परिजन चिकित्सकीय उपचार के बजाय प्रसूता को गैर-चिकित्सकीय उपचार पर ले गए। यदि स्वास्थ्य विभाग की टीम और ग्राम सरपंच समय पर हस्तक्षेप नहीं करते, तो एक मां की जान भी खतरे में पड़ सकती थी।

 मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. जीवराज मीणा ने बताया कि ग्राम वीरपुर निवासी गर्भवती महिला को अचानक तेज पेट दर्द होने पर उसने गांव की आशा कार्यकर्ता गोती और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारी (सीएचओ) धर्मेश से संपर्क किया। दोनों ने बिना समय गंवा, उसे जिला चिकित्सालय पहुंचाया। जहां विशेषज्ञ चिकित्सकों ने जांच के बाद बताया कि गर्भस्थ शिशु की धड़कन बंद हो चुकी है और महिला की जान बचाने के लिए तत्काल चिकित्सकीय प्रक्रिया आवश्यक है, लेकिन यह सुनते ही परिजन महिला को अस्पताल में भर्ती कराने के बजाय किसी गैर-चिकित्सकीय उपचार पर लेकर चले गए। हर गुजरता पल प्रसूता के लिए खतरा बढ़ा रहा था।

जैसे ही इसकी सूचना सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र सुहागपुरा के चिकित्साधिकारी डॉ. हरिओम महावर तक पहुंची, उन्होंने इसे केवल एक चिकित्सा प्रकरण नहीं, बल्कि एक मां के जीवन का प्रश्न माना। उन्होंने तत्काल ग्राम सरपंच श्यामलाल मीणा से संपर्क किया। चिकित्सा विषयों की समझ रखने वाले नर्सिंग पास सरपंच स्वयं चिकित्साधिकारी के साथ परिजनों के पास पहुंचे। दोनों ने धैर्य, संवेदनशीलता और मानवीय दृष्टिकोण से परिजनों को समझाया कि अब प्राथमिकता मां का जीवन बचाना है।


काफी समझाइश के बाद परिजन राजी हुए। तुरंत 108 एम्बुलेंस की सहायता से महिला को जिला चिकित्सालय पहुंचाकर भर्ती कराया गया, जहां समय पर उपचार शुरू हुआ और उसकी जान सुरक्षित बचाई जा सकी। यह घटना केवल एक सफल चिकित्सकीय प्रयास नहीं, बल्कि स्वास्थ्य विभाग की उस मानवीय संवेदनशीलता का उदाहरण है, जिसमें आशा कार्यकर्ता, सीएचओ, एएनएम, चिकित्साधिकारी, 108 एम्बुलेंस सेवा और ग्राम सरपंच ने मिलकर एक मां को नया जीवन दिया।


मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. जीवराज मीणा ने कहा कि गर्भावस्था के दौरान किसी भी प्रकार की समस्या होने पर अंधविश्वास या गैर-चिकित्सकीय उपचार के बजाय तत्काल नजदीकी स्वास्थ्य संस्थान से संपर्क करना चाहिए। समय पर मिला उपचार ही मां और बच्चे दोनों के जीवन की सबसे बड़ी सुरक्षा है। उन्होंने स्वास्थ्य टीम की तत्परता तथा ग्राम सरपंच के सहयोग की सराहना करते हुए कहा कि विभाग का उद्देश्य प्रत्येक गर्भवती महिला को समय पर सुरक्षित एवं गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना है।

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