लोकेशन -अलवर
राजस्थान की राजनीति और साहित्य जगत से अलवर जिले के दिग्गज राजनेता, वरिष्ठ साहित्यकार और मुंडावर विधानसभा क्षेत्र के पूर्व विधायक महेंद्र शास्त्री का 95 वर्ष की आयु में सोमवार को निधन हो गया। उन्होंने अलवर शहर के मोती डूंगरी स्थित अपने निज निवास पर अंतिम सांस ली। उनके निधन से पूरे प्रदेश में शोक की लहर दौड़ गई है।
महेंद्र शास्त्री के जीवन की मुख्य विशेषताएँ की उन्होंने वर्ष 1985 के विधानसभा चुनाव में अलवर जिले की मुंडावर सीट से लोकदल के टिकट पर शानदार जीत हासिल की थी और लगभग 80 वर्ष की आयु तक सक्रिय राजनीति में अपना प्रभाव बनाए रखा।
भले ही उन्होंने अपना मुख्य चुनाव लोकदल से जीता था, लेकिन बाद के वर्षों में राजस्थान कांग्रेस के भीतर उनके मार्गदर्शन, आंतरिक घटनाक्रमों और चुनावी रणनीतियों पर गहरी पकड़ के कारण उन्हें कांग्रेस का 'भीष्म पितामह' और वरिष्ठ मार्गदर्शक माना जाता था।
वहीं सहकारिता आंदोलन में उनके अतुलनीय योगदान के लिए वे कॉपरेटिव सोसाइटी के अध्यक्ष रहे और उन्हें 'सहकारिता रत्न' के सम्मान से भी नवाजा गया था।
वे राजस्थान में जाट समाज के बीच भारी प्रभाव रखते थे और जाट आरक्षण आंदोलन को शांतिपूर्ण व तार्किक ढंग से मुकाम तक पहुँचाने वाले प्रमुख स्तंभों में से एक थे।
शास्त्री राजनेता होने के साथ-साथ वे एक प्रखर वक्ता, प्रसिद्ध कवि और प्रतिष्ठित लेखक थे। उनकी प्रमुख कृतियों में 'यादों की महक', 'चलते-चलते कहां आ गए' और 'मानव मन अकथ कहानी' जैसी प्रसिद्ध किताबें शामिल हैं।
दिवंगत नेता की अंतिम यात्रा उनके अलवर स्थित मोती डूंगरी निवास स्थान से निकाली गई जिसमें प्रदेश भर के क ई राजनीतिक दिग्गज जनप्रतिनिधि कांग्रेस कार्यकर्ता और गणमान्य नागरिकों ने शामिल होकर अंतिम विदाई दी ।

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