महाराजा भर्तृहरि नाटक के श्रृंगार शतक में महारानी पिंगला के हिंडोल क्रीडा के दृश्य में महाराजा भर्तृहरि महारानी पिंगला के श्रृंगार एवं प्रेम में इतना डूब जाते हैं कि राजकार्य और राज्य संचालन तक को भूल जाते हैं। महाराजा भर्तृहरि महारानी पिंगला के शारीरिक सौंदर्य और बनावट की प्रशंसा करते हुए उन्हें ग्रहों का पुंज तक बता देते हैं। स्वयं न्यायाधीश होते हुए भी श्रृंगार रस में डूबे होने के कारण महारानी पिंगला को न्यायाधीश की संज्ञा देते हैं और उनकी हिंडोली कीड़ा में विघ्न उत्पन्न करने पर उनसे दंड का प्रावधान भी करवाते हैं। दृश्य के अंत में महाराजा भर्तृहरि महारानी पिंगला को स्वयं झूला झुलाकर अपने आप को महारानी पिंगला के प्रेम में समर्पित कर देते हैं।
झूले का सीन और महाराजा भर्तृहरि को महारानी पिंगला के प्रेम में इतने व्याकुल और अभिभूत देखकर, दर्शकों ने भी इस श्रृंगार रस का भरपूर आनंद लिया और रोमांचित हो गए।
इससे पूर्व एक दृश्य में सेठ मायादास के मित्र चंद्रशेखर शास्त्री जब तपस्या करने जाते हैं तो अपनी पुत्री मोहिनी को सेठ मायादास के सुपुर्द करते हैं और सेठ मायादास धनोपाजर्न के लिए मोहिनी को नृत्यांगना बना देते हैं।
मोहिनी की महफिल के दृश्य में क्रूरसिंह (गुरु गोरखनाथ) महफिल में जाते हैं और उसके नृत्य को देखकर अपनी माया के अनुसार मोहिनी पर मोहित हो जाते हैं। क्रूरसिंह मोहिनी को अपनी प्रेयसी बनाते हैं। मोहिनी की महफिल के प्रमुख पात्र नैनसुख, लाला और पंडितजी के संवादों ने सभी दर्शकों को बहुत हँसाया, गुदगुदाया और रोमांचित किया।

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