चित्र नहीं चरित्र की पूजा करें - डॉ दिव्य प्रभा जी महाराज साहब

(चितौडगढ  नरेन्द्र सेठिया )
चित्तौड़गढ़ पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व के छठे दिन प्रवचन करते हुए श्रमणी सूर्या वाणी भूषण महा साध्वी श्री डॉ दिव्य प्रभा जी महाराज साहब ने फरमाया कि जिस प्रकार मकान सब सुविधाओं से युक्त होता है, बहुत सुंदर फर्नीचर बना हुआ होता है, बढ़िया रंग रोगन हो, आलीशान मकान के ऊपर यदि छत नहीं हो तो उस मकान का कोई महत्व नहीं रह जाता है। उसी प्रकार व्यक्ति का चेहरा चाहे कितना भी सुंदर हो, कितना भी ज्ञान हो, कितनी भी कलाएं हो, लेकिन चरित्र नहीं, आचरण नहीं, संयम नहीं, तो उसका कोई महत्व नहीं। भोजन बहुत अच्छा हो लेकिन उसमें विटामिन नहीं तो उसे भोजन का क्या फायदा। 

व्यक्ति के दो रूप होते हैं। एक शारीरिक रूप और एक आध्यात्मिक रूप। एक बाह्य रूप, एक आंतरिक रूप। शारीरिक रूप में व्यक्ति की सुंदरता चेहरे की चमक,
 तेज, सुडौल शरीर, गोर वर्ण आदि व्यक्ति के बाह्य स्वरूप की शोभा बढ़ाते हैं। लेकिन मनुष्य के आंतरिक के रूप पर प्रकाश डालें जिसके जीवन में सदाचार, सद व्यवहार, संयम, सुसंस्कार, सरलता, सहजता जैसे गुण नहीं है तो उसकी बाह्य सुंदरता का कोई महत्व नहीं। कस्तूरी काली होती है लेकिन वह तोले में तो ली जाती है। उसका मूल्य बहुत अधिक है। शक्कर सफेद है फिर भी वह किलो में तोली जाती है। उसका मूल्य कम है। एक वेश्या रूप बेचकर एक वैद्य रूप बेचकर नरक के मार्ग खोल रही है उसको सब गिरी हुई नजरों से देखते हैं और दूसरा कोई चरित्रवान साधु या सत्यवान स्त्री गुणवान मनुष्य हो तो उसको सब आदर से देखते हैं।

 सम्मान करते हैं जीवन का सारभूत तत्व चरित्र है। संयम आत्म नियंत्रण है मन वचन काया पर नियंत्रण है  इन्द्रियों पर नियंत्रण है। कोई भी देश संयम से प्रगति करता है। उत्थान होता है। रवींद्र नाथ टैगोर जब चीन गए थे तो सब चीनियों ने उनका सम्मान किया भारतीय वाङ्मय का अध्ययन किया और भारतीयों के चरित्र की प्रशंसा की। भारत ऋषि प्रधान देश है यहां आत्म दृष्टा ऋषि महर्षि हुए हैं अपने तपो तेज से उन्होंने दूसरों को भी प्रकाशित किया है। मुंशी प्रेमचंद ने कहा संयम से शक्ति प्राप्त होती है और शक्ति से आनन्द प्राप्त होता है। संयम और दृढ़ धर्मिता के कारण वीर दुर्गादास बेगम गुलनार के शादी के प्रस्ताव को ठुकरा कर  औरंगजेब के कैद खाने से ससम्मान मुक्त हो गए। हम भी अपने जीवन को चरित्रमय संयममय सदाचारमय बनाऐ।
इससे पूर्व परम पूज्या श्री निरुपमाजी महाराज साहब ने अंत ग्रहण सूत्र का सुंदर वचन करते हुए अर्जुन माली के जीवन पर प्रकाश डाला। श्री कमलेश जी रांका श्री गौतम जी रांका श्री सुरेशजी चंडालिया ने अपने विचार व्यक्त किये।

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