चिकारड़ा।हर साल गर्मियों में आने वाले पशुपालक अक्टूबर में ही पहुंचे, चारे-पानी के गंभीर संकट के चलते हुआ समय पूर्व विस्थापन
चिकारड़ा । मारवाड़ क्षेत्र में इस वर्ष कमजोर मानसून और अल्पवर्षा के चलते उपजे गंभीर जल व चारे के संकट ने पारंपरिक पशुपालकों को समय से काफी पहले विस्थापन की राह पर धकेल दिया है। अमूमन हर साल गर्मियों के दिनों में मेवाड़ का रुख करने वाले मारवाड़ के गडरिए इस मर्तबा करीब 5 महीने पहले, अक्टूबर की शुरुआत में ही ऊंटों और हजारों भेड़ों के कई विशाल झुंड लेकर चिकारड़ा क्षेत्र में पहुंच चुके हैं। समय से पहले हुए इस भारी आगमन को देखकर स्थानीय ग्रामीण हैरान हैं और इसे पश्चिमी राजस्थान में सूखे व अकाल की सीधी आहट मान रहे हैं।
चारे-पानी की किल्लत से समय पूर्व छूटा घर-आंगन-
पशुपालकों का कहना है कि वे हर साल लेट (गर्मियों के मौसम में) इस तरफ आते थे, लेकिन इस बार मारवाड़ में बारिश की भारी कमी के चलते चारागाह सूख चुके हैं और नाडियां-तालाब दम तोड़ रहे हैं। बेजुबान मवेशियों को भुखमरी से बचाने के लिए वे लाचार होकर 5 महीने पहले ही अपने ऊंटों और भेड़ों के कई झुंडों को साथ लेकर इधर निकल पड़े हैं।
प्रकाश सुथार ने जताई चिंता-
स्थानीय प्रबुद्ध नागरिक प्रकाश सुथार ने बताया कि हर वर्ष यह पशुपालक गेहूं की कटाई के बाद गर्मियों में आते थे, लेकिन इस बार मक्का की कटाई के समय अक्टूबर में ही इनका यहां पहुंच जाना मारवाड़ में गंभीर सूखे और अकाल का स्पष्ट संकेत है। उन्होंने कहा कि चिकारड़ा की सड़कों और खुले मैदानों में ऊंटों और भेड़ों के इतने बड़े-बड़े झुंडों का इतनी जल्दी दिखना यह साफ दर्शाता है कि रेगिस्तानी इलाकों में हालात बेहद नाजुक हो चुके हैं और आने वाले दिनों में ऐसे और भी कई बड़े काफिले इस क्षेत्र में प्रवेश करेंगे।
चिकारड़ा में डाला अस्थाई पड़ाव-
अचानक पहुंचे इन विशाल रेवड़ों के साथ चल रहे पशुपालकों के लिए इस समय चारे और ठहरने की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। चिकारड़ा व आसपास के खुले स्थानों पर कुछ दिन अस्थाई पड़ाव डालने के बाद यह कारवां आगे के हरित अंचलों की ओर कूच करेगा। बेजुबान पशुओं और संघर्षरत पशुपालकों की इस विकट स्थिति को देखकर स्थानीय ग्रामीण भी गहरी संवेदनशीलता जता रहे हैं।
إرسال تعليق